विद्यार्थी जीवन और तंदुरुस्ती

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6. सुस्त नहीं, चुस्त बनें
हम इस बात को अच्छे से जानते हैं कि ‘आलस्य’ मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी बुराई है अर्थात कमज़ोरी है। लेकिन यह हमारे विद्यार्थी जीवन में बहुत हद तक नुकसानदायक साबित होता है क्योंकि कि आलस्य आशा को निराशा में और सफलता को असफलता में बड़ी आसानी से बदल देता है। इतना ही नहीं आलसी बने रहकर हम अपने लक्ष्य के करीब पहुँचकर भी उसे पाने में असमर्थ रहेंगे। ऐसे में हम अपने जीवन को सफलता की ओर ले जाने में भी नाकाम साबित होंगे और स्वयं को परेशानी में भी डाल देंगे। जरा सोचिये यदि कोई व्यक्ति आलसी है और खाली बैठा है तो इसका यह तो मतलब नहीं कि वह चिंता से मुक्त है। नहीं बल्कि आलस्य में खाली बैठा व्यक्ति अपनी ओर चिंता को अधिक आकर्षित करता है – क्योंकि जब भी हम आलस्य के कारण खाली बैठते हैं तो हमारा दिमाग हमेशा शैतान बना रहता है। जिस वजह से दिमाग नकारात्मक बातों को अधिक सोचता है, जो हमारे व्यक्तिगत जीवन में चिंता का कारण बन जाती है। जो हमें पूर्ण रूप से जकड़ लेती है और जीवन में उबरने से रोकती है। ऐसे समय में हम अपना कोई भी कार्य समय पर और पूर्ण संतुष्टि से नहीं कर पाते।

यदि हम गहराई से सोचें तो यह साबित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने तन की बजाय मन से अधिक आलसी होता है। हमारी यह आलसी मानसिकता ही है जो प्रत्येक कार्य में बाधा बनकर हमारे कार्यों को कल पर टाल देती है। इसलिए इस आलसी मानसिकता को दूर करने के लिए हम थोड़ा सा तंदुरुस्त मन से सोचें कि मुझे आलसी नहीं बनना आलस्य नहीं करना और स्वयं को चुस्त रखने की मंशा बना लें तो अवश्य हम अपने कार्य को समय के साथ पूरा करेंगे और सफल भी होंगे।
परन्तु इसके लिए चाहिए कि हम स्वयं को प्रत्येक समय अच्छे अच्छे कार्यों में व्यस्त रखें, अपनी दिनचर्या का ध्यान रखें। साथ ही अपने खाली समय का सदुपयोग अच्छी पुस्तकें, पत्र- पत्रिकाएं पढ़कर करें। इसके साथ साथ हम उन कार्यों को सर्वप्रथम पूरा करने की योजना बनायें जो हमारे लिए बेहद जरूरी है। और उन कार्यों को समय पर पूरा करें तो हम बहुत हद तक आलस्य को त्याग सकते हैं ।
“यदि हम प्रत्येक कार्य को कल पर टालते रहेंगे
तो हम दूसरों से हर रोज एक दिन पीछे रहते चले जायेंगे ।

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