विद्यार्थी जीवन और अच्छा रहन – सहन

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2. विद्यार्थी जीवन और अच्छा रहन – सहन
हमारा जन्म सिर्फ और सिर्फ अच्छा और सफल जीवन जीने के लिए हुआ है, ऐसा जीवन जो कष्टों, दुखों में काटने की बजाय कुशल और जीने की तमन्ना से भरा हो। लेकिन ऐसा जीवन तभी संभव है जब हमारा रहन- सहन, आदतें और माहौल अच्छा हो ऐसे में सफल जीवन के आनंद और भी अच्छे हो जाते हैं।
जी हाँ यहाँ बात की जा रही है हमारे व्यक्तिगत रहन – सहन हमारी आदतों और हमारे आसपास के माहौल की अर्थात् हम कैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अच्छा रहन – सहन अच्छी आदतें ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन अच्छी आदतें और रहन- सहन निर्भर करता है हमारे आसपास के माहौल पर – जैसा माहौल वैसा हम स्वयं को ढाल लेंगे, लेकिन यह माहौल जुड़ा है हमारे “नजरिये” से। हमारा रहन- सहन और आदतें अच्छी है तो हमारा नजरिया समाज के प्रति और समाज का नजरिया हमारे प्रति अच्छा ही होगा। और यदि बूरा है तो इसके बिल्कुल विपरीत। देखिये अच्छा रहन – सहन केवल दिखने में अच्छा नहीं बल्कि इससे हमारी आदतें और सोच दोनों का स्तर भी काफी ऊंचा होगा।
सोचिए यदि हम घर से बाहर नंगे पांव या फटे मेले वस्त्र पहन कर निकलें तो हमारी मानसिकता क्या है? और दूसरी बार जूते और साफ वस्त्रों में घर से बाहर जाये तो हमारी सोच क्या है, “यहाँ मतलब कीमती वस्त्र पहनने से नहीं बल्कि बात की गहराई को समझें
अर्थात् दोनों जगहों पर हमारा रवैया और व्यवहार दूसरों के साथ अलग अलग होगा चाहे वह दूसरों से मिलने में हो या बोलचाल में।ऐसा शायद दूसरी बार में हो क्योंकि वहाँ हमारी सोच उच्च स्तर की है, इसलिए बात यह है कि ऐसा करने के लिए हमें स्वयं के तन की बजाय मन को सुन्दर विचारों से ढकना होगा।
शायद आप अब यह अच्छे से समझ चुके होंगे कि यदि हमारे आसपास या घर का माहौल अच्छा है तो हम दूसरों से प्रत्येक तरह से अच्छा व्यवहार करेंगे और स्वयं की आदतों को भी उसी अनुरूप ढाल लेंगे। जिससे हमारी भावनाएं ऐसी बन जायेगी कि हम चाहेंगे – सम्मानजनक और उच्च स्तर का जीवन जीयें और हमारी पहचान अच्छे लोगों में हो । ऐसे में हम कठिन परिश्रम करने को भी तैयार हैं क्योंकि हम अपने जीवन स्तर को गिरता नहीं देखना चाहते। कल्पना कीजिए यदि कोई बच्चा स्कूल से घर आकर अपने स्कूल बैग और कपड़ों को उतार कर सही ढंग से रखने की बजाय उलटा – सीधा, इधर – उधर डाल देता है और वह ऐसा हर रोज करता रहे, और उसे इस आदत को सुधार करने का न कहा जाए, तो यह एक दिन उसके जीवन की बड़ी कमजोरी बन जायेगी
इसी प्रकार यदि कोई “व्यक्ति” ऐसे”व्यक्ति” के सम्पर्क में रहे जो नशा करता हो जिसकी जुबान पर भद्दे शब्द हर समय रहे और वह समाज को घटिया बताता हो, तो क्या वह व्यक्ति भी उस जैसा नहीं बन जाएगा? अवश्य वह स्वयं के रहन – सहन को भी उसी के अनुरूप ढाल लेगा, और उस जैसी आदतों का शिकार हो जायेगा यहाँ तक कि अब उस व्यक्ति की सोच भी वहां तक सीमित रहेगी।
दूसरी तरफ आप कल्पना कीजिए यदि हमारी दोस्ती या सम्पर्क ऐसे व्यक्ति के साथ हो – जिसका रहन- सहन अच्छा है और दूसरों से बहुत ही मिलनसार व्यवहार करने वाला हो और अपनी लगन मेहनत से वह व्यक्ति गरीबी से अमीरी के रस्ते पर चल पड़ा हो, तो क्या हम भी स्वयं को उस जैसा नहीं बनाना चाहेंगे। ‘अवश्य’ अब तो हम साथ रहकर उस जैसे बन भी जायेंगे क्योंकि उसके साथ रहकर हमारी आदतें स्वतः ही अच्छी होती चली जायेगी। ऐसे व्यक्ति का साथ पाकर हम कोई गलत कदम उठाने में शर्मिंदगी महसूस करेंगे। अब हम उस जैसा नेक और पैसे वाला बनने के लिए मेहनत भी करेंगे और ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में रहने से हमारी सोच उच्च प्रवृत्ति की बनेगी जिससे हम हर रोज तरक्की करना चाहेंगे।
और एक दिन अवश्य “सफल” होंगे।
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