विद्यार्थी जीवन में चिंता व्यर्थ

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कहा जाता है कोई दूसरा विकार या प्रहार इंसान का कुछ बिगाड़ पाये या नहीं लेकिन ‘चिंता’ वह है जो इंसान को खुर्द कर खा जाती है अर्थात् इंसान को अन्दर से बिल्कुल खोखला कर देती है जिससे अपनी मानसिक और शारीरिक दोनों शक्तियां खो बैठता है। लेकिन फिर भी चिंता इंसान को किसी न किसी रूप में घेरे रहती है। या फिर कहें कि हम यह जानते हुए कि चिंता खतरनाक है फिर भी हम इसे अपने दिमाग में लेकर बैठे रहते हैं। आपने बहुत से लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि – हम चिंता करते नहीं बल्कि हो जाती है। क्या वास्तविकता यही है कि कोई व्यक्ति चिंता करता नहीं बल्कि हो जाती है।तो समझ लीजिए अपनी चिंता के जिम्मेदार हम खुद हैं, कोई और नहीं। क्योंकि इसके पीछे हमारी कुछ न कुछ कमजोरी अवश्य होती है चाहे इसे हम अपनी भूल कहें। लेकिन क्या कभी आपने विचार किया कि चिंता की मूल वजह क्या है? शायद नहीं। चिंता का मूल कारण यही रहता है कि हम यह नहीं समझते कि हमारी चिंता की वजह क्या है – बस यही सोच लेते हैं कि चिंता होना तो लाजमी है। चिंता के कुछ मुख्य कारण यह भी होते हैं जो हमारी वर्तमान से उठकर भविष्य में नजर चली जाती है जैसे –
कौन जाने क्या होगा। , क्या मालूम इस कार्य का क्या नतीजा रहेगा।
आदि बातें अब दूसरी तरफ एक विद्यार्थी भी स्वयं को मामूली बातों को लेकर चिंतित रहता है जैसे –
मेरा पेपर कितना कठिन होगा।, मेरा परीक्षा परिणाम कैसा रहेगा।, क्या मैं सफल हो पाऊंगा या नहीं ।
बस यही बातें हैं जो हमारी चिंता का कारण बनी रहती है। बल्कि इन बातों को वर्तमान समय में सोचने का हमें कोई फायदा भी नहीं होता और ना ही इनकी जरूरत होती है। क्योंकि यह सब हमारे हाथ में अर्थात् हमारी मेहनत पर निर्भर करता है। कि हम किसी कार्य को कैसे ओर कहाँ तक संभव बना सकते हैं। क्योंकि हमें उस वक्त चिंता की नहीं बल्कि चिंतन – मनन की जरूरत होती है। हम इस बात को अच्छे से समझते हैं कि गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमारा कार्य केवल कर्म करना है न कि फल की इच्छा/चिंता करना। लेकिन यह निश्चित है कि यदि हम कर्म करने की बजाय पहले उसके फल और नतीजे के बारे में सोचेंगे तो चिंता होगी ही। जिस वजह से हम अपना कार्य शायद ही पूरा कर पायेंगे जो कि बढ़ती चिंता का कारण बन जाएगा। एक बात गहराई से सोचिये कि क्या हम किसी बात की चिंता करके उसका निवारण कर लेंगे?, क्या विद्यार्थी परिणाम को चिंता के बल पर बेहतर बना लेगा शायद नहीं। क्योंकि इन सबके लिए हमें चिंता नहीं बल्कि मेहनत करनी होगी चिंता क्यों है इस बात की जड़ तक जाना होगा। तभी हम चिंता से मुक्त रह सकते हैं। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का चिंता से दूर रहना बेहद ज़रूरी है वो इसलिए क्योंकि पहले हमें अपनी इच्छा और कार्य की चिंता होती है लेकिन बाद में यह चिंता को कैसे दूर करें इस चिंता में बदल जाती है अर्थात् मानसिक तनाव। इसलिए चिंता मुक्त होने के दो रास्ते हैं – मेहनत और ध्यान ->> ध्यान में भगवान।
प्रिय विद्यार्थियो आपको यह लेख कैसा लगा अपनी राय जरूर लिखें।

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