विद्यार्थी जीवन में सही मार्गदर्शन का महत्व

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प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में सही मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है।अब चाहे वह किसी भी रूप में और किसी भी कार्य के लिए क्यों न हो। इसी प्रकार विद्यार्थी को भी प्रत्येक कदम पर सही मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। सही मार्गदर्शन के बल पर ही हम अपने विद्यार्थी जीवन अर्थात् सम्पूर्ण जीवन के सही फैसले ले सकते हैं विद्यार्थी के लिए बहुत जरूरी होता है कि वह अपने शिक्षा से जुड़ा प्रत्येक निर्णय सही रूप में ले। प्रत्येक विद्यार्थी के लिए उसके विद्यार्थी जीवन से संबंधित निर्णय में यदि मामूली चूक या जल्दबाजी हो जाये तो वह निर्णय भविष्य में बाधा बन जाता है।सही मार्गदर्शन की समस्या उन विद्यार्थियों के लिए जो विद्यार्थी ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश लेते हैं के सामने एक अजनबी व्यक्ति के चौराहे पर खड़े होने के समान है।ऐसे वक्त में एक विद्यार्थी के लिए यह निर्णय कर पाना मुश्किल होता है कि वह किस संकाय को चुनें। ऐसे में एक विद्यार्थी इतना भी अनुभवी नहीं होता कि वह स्वयं सही निर्णय ले सके। आम तौर पर यही होता है कि एक विद्यार्थी अपने दोस्तों की देखा- देखी संकास और विषय का चयन करता है, या फिर वह अपने परिवार के सदस्यों के कहे अनुसार संकाय एवं विषय चुन लेता है -जो उसे छोटे से अनुभव के आधार पर कहते देते हैं। हो सकता है ऐसे निर्णय विद्यार्थी के लिए भविष्य में सही साबित ना हो अर्थात् विद्यार्थी किसी अन्य संकाय और विषय का इच्छुक और रुचि रखने वाला हों। खास तौर पर यह फैसला उन लड़कीयों या विद्यार्थियों के लिए गलत साबित हो सकता है -जिन्हें परिवार के लोग अपने गांव शहर या घर से दूर पढ़ने नहीं भेजना चाहते। तो ऐसे में उन लड़कियों एवं विद्यार्थियों को मजबूरन ऐसा संकाय एवं विषय लेना पड़ता है जो उनके परिवार वाले कहते हैं या नजदीक के स्कूलों में होता है।शायद विद्यार्थी उस संकाय या विषय से पूर्णतः संतुष्ट ना भी हो।इसलिए आज विद्यार्थी के लिए सही मार्गदर्शन के रूप में ऐसे विशेषज्ञों की भी जरूरत है जो प्रत्येक विद्यार्थी की शिक्षा एवं संकाय संबंधी रुचि एवं योग्यता को पहचान कर उन्हें सही फैसला दिलवा सके। परन्तु दूसरी तरफ कुछ विद्यार्थियों के दिमाग में ऐसा भ्रम पला होता है कि वे संकाय को छोटा बड़ा मानने लगते हैं। लेकिन जरूरी यह है कि विद्यार्थी इस बात से सहमत हो कि कोई भी संकाय या विषय बड़ा -छोटा नहीं है चाहे वह कला,विज्ञान,वाणिज्य या फिर कृषि से संबंधित हो। यदि दिमाग में यह गलत -फहमी है कि शिक्षा में कमजोर एवं योग्य विद्यार्थी के लिए अलग -अलग (सरल -कठिन) संकाय को बनाया है तो इस वहम को दिमाग से निकाल फेंकना होगा। क्योंकि ऐसा बिलकुल नहीं है बल्कि यह तो प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिभा एवं रुचि पर निर्भर करता है कि वह किस क्षेत्र में जाना चाहता है। हम अपनी प्रतिभा एवं रुचि से किसी भी संकाय में महारत हासिल कर सकते हैं। चिंता की बात तो यह है कि जब किसी विद्यार्थी से यह पूछा जाता है कि वह किस संकाय का विद्यार्थी है तो विज्ञान,कृषि या अन्य संकाय के विद्यार्थी बहुत हौसले से अपने संकाय को बताते हैं। लेकिन कला(आर्ट) संकाय के विद्यार्थी से पूछा जाता है तो वह निराश एवं असंतुष्ट करने वाला जवाब देता है –कि उसके पास”कला(आर्ट)” “ही” है परन्तु सोचने वाली बात तो यह है कि ऐसा क्या है जो विद्यार्थी को “ही” शब्द का प्रयोग करना पड़ रहा है। अर्थात् यह बताने में हिचकिचाहट महसूस हो रही है कि हम कला संकाय के विद्यार्थी हैं। लेकिन हमें यह नहीं मालूम कि यह”ही” शब्द अर्थात् किसी संकाय या विषय को कम आंकना हमें जिन्दगी में महान बनने से रोक देता है। क्योंकि फिर हम यह मानने लगते हैं कि यह संकाय तो उन छात्रों के लिए है जो पढ़ाई में कमजोर है अर्थात् स्वयं को कम आंकना। परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है कि कोई संकाय या विषय बड़ा -छोटा हो,यह सिर्फ गलत मानसिकता है। ऐसा सोचकर तो प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी स्वयं को कमजोर समझता है। और यही कारण होता है कि इससे विद्यार्थी की पढ़ाई में रुचि भी कम रहती है। ऐसी सोच ही विद्यार्थी को अपने जीवन में कमजोर और असफल विद्यार्थी बना देती है। तो हमें उन व्यक्तियों को देखकर आगे बढ़ने की सीख लेनी चाहिए जिन्होंने कला,वाणिज्य,कृषि,विज्ञान या अन्य किसी भी संकाय से जीवन में महान सफलता हासिल की है। क्यों कि उन व्यक्तियों ने संकाय को छोटा बड़ा समझने की बजाय अपनी सोच -प्रतिभा -रुचि को बढ़ाया और जीवन में महान और कठिन लक्ष्यों को पाया।

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